पाठ्यक्रम: GS3/संबद्ध क्षेत्र
संदर्भ
- भारत की कृषि प्रगति को पशुपालन, डेयरी, पोल्ट्री और मत्स्य पालन जैसे सहयोगी क्षेत्रों के विस्तार से लगातार समर्थन मिल रहा है।
भारत में सहयोगी क्षेत्र
- सहयोगी कृषि गतिविधियों में पशुपालन और मत्स्य पालन ने लगभग 5–6% की अपेक्षाकृत स्थिर वृद्धि दर प्रदर्शित की है।
- वित्त वर्ष 2015 से 2024 के बीच इस क्षेत्र का सकल मूल्य वर्धन (GVA) लगभग 195% बढ़ा, जो वर्तमान मूल्यों पर 12.77% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) को दर्शाता है।

- डेयरी नेटवर्क में शामिल हैं:
- 22 दुग्ध महासंघ, 241 जिला संघ, 28 विपणन डेयरियाँ,
- 25 दुग्ध उत्पादक संगठन (MPOs), जो लगभग 2.35 लाख गाँवों और 1.72 करोड़ किसान-सदस्यों को कवर करते हैं।
- भारत 2028–29 तक प्रतिदिन 10 करोड़ लीटर दूध प्रसंस्करण क्षमता के नियोजित विस्तार के माध्यम से मूल्य संवर्धन को सुदृढ़ कर रहा है।
भारत के सहयोगी क्षेत्र का महत्व
- किसानों की आय में वृद्धि: यह मौसमी फसल कृषि के विपरीत पूरक और नियमित आय प्रदान करता है। इससे मानसून-निर्भर फसल उत्पादन पर निर्भरता कम होती है।
- कृषि GVA में प्रमुख योगदानकर्ता: सहयोगी क्षेत्र कृषि सकल मूल्य वर्धन (GVA) में 40% से अधिक योगदान करते हैं।
- केवल पशुपालन क्षेत्र ही कृषि-GVA में लगभग 30% योगदान देता है, जिससे यह उच्च-विकास खंड बनता है।
- रोज़गार सृजन: डेयरी, मत्स्य पालन और पोल्ट्री जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्र बड़े पैमाने पर ग्रामीण रोज़गार उत्पन्न करते हैं।
- महिला सशक्तिकरण: डेयरी, पोल्ट्री और छोटे पशुपालन में महिलाओं की उच्च भागीदारी स्व-सहायता समूहों (SHGs) एवं ग्रामीण उद्यमिता को सुदृढ़ करती है, विशेषकर अमूल जैसे सहकारी मॉडल के अंतर्गत।
- पोषण सुरक्षा: यह प्रोटीन-समृद्ध खाद्य (दूध, अंडे, मछली, मांस, शहद) प्रदान करता है और कुपोषण को संबोधित करते हुए खाद्य एवं पोषण सुरक्षा लक्ष्यों का समर्थन करता है।
- निर्यात क्षमता: भारत दूध और मछली के वैश्विक शीर्ष उत्पादकों में से एक है। समुद्री निर्यात विदेशी मुद्रा आय में महत्वपूर्ण योगदान देता है।
चिंताएँ
- कम उत्पादकता: भारत में प्रति पशु दूध उत्पादन वैश्विक औसत से कम है।
- मत्स्य पालन और पशुपालन की उत्पादकता कमजोर नस्ल गुणवत्ता एवं सीमित वैज्ञानिक प्रबंधन के कारण प्रभावित होती है।
- बुनियादी ढाँचे की कमी: अपर्याप्त कोल्ड स्टोरेज, प्रसंस्करण और परिवहन सुविधाएँ।
- रोग प्रकोप: लम्पी स्किन डिज़ीज़ और एवियन इन्फ्लुएंज़ा जैसी बार-बार होने वाली पशुधन बीमारियाँ, कमजोर पशु-चिकित्सा ढाँचे एवं सीमित बीमा कवरेज के साथ किसानों की संवेदनशीलता बढ़ाती हैं।
- ऋण एवं बीमा बाधाएँ: छोटे और सीमांत किसानों के लिए संस्थागत ऋण तक सीमित पहुँच।
- जलवायु परिवर्तन का प्रभाव: तटीय मत्स्य पालन चक्रवातों, समुद्र-स्तर वृद्धि और महासागर के गर्म होने के प्रति संवेदनशील है।
- पर्यावरणीय चिंताएँ: अत्यधिक मछली पकड़ना और समुद्री संसाधनों का क्षय तथा पशुधन से मीथेन उत्सर्जन ग्रीनहाउस गैसों में योगदान करते हैं।
सरकारी पहल
- राष्ट्रीय पशुधन मिशन: पशुधन-आधारित उद्यमिता को बढ़ावा देता है, नस्ल उत्पादकता में सुधार करता है और मांस, अंडे, दूध एवं चारे के उत्पादन को बढ़ाता है।
- राष्ट्रीय गोकुल मिशन: स्वदेशी गोवंश नस्लों के संरक्षण, दूध उत्पादकता में वृद्धि और ग्रामीण किसानों के लिए डेयरी को अधिक लाभकारी बनाने पर केंद्रित है।
- राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम (NADCP): फुट एंड माउथ डिज़ीज़ (FMD) और ब्रुसेलोसिस को नियंत्रित करने हेतु गाय, भैंस, भेड़, बकरी एवं सूअर का 100% टीकाकरण।
- केंद्रीय बजट 2026-27: मत्स्य पालन के लिए ₹2,761.80 करोड़ का रिकॉर्ड आवंटन, जो ब्लू रेवोल्यूशन के अंतर्गत सतत निवेश को सुदृढ़ करता है।
- प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY): मत्स्य विकास को बुनियादी ढाँचे, आधुनिकीकरण और मूल्य श्रृंखला सुदृढ़ीकरण के माध्यम से बढ़ावा देती है ताकि उत्पादन, निर्यात, रोज़गार एवं मछुआरों की आय में वृद्धि हो।
- प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजना (PM-MKSSY): PMMSY की उप-योजना, जो बीमा, ऋण, प्रदर्शन प्रोत्साहन और ट्रेसबिलिटी के माध्यम से क्षेत्र का औपचारिककरण करती है ताकि आय सुरक्षा एवं स्थिरता में सुधार हो।
- राष्ट्रीय मधुमक्खी पालन एवं शहद मिशन (NBHM): 2020 में आत्मनिर्भर भारत अभियान के अंतर्गत वैज्ञानिक मधुमक्खी पालन के समग्र प्रचार और विकास हेतु शुरू की गई केंद्रीय क्षेत्र योजना, जिसका लक्ष्य “स्वीट रेवोल्यूशन” है।
- मिशन-आधारित जलाशय विकास एवं मत्स्य मूल्य श्रृंखला विस्तार: भारत के पास लगभग 31.5 लाख हेक्टेयर में फैला विश्व का सबसे बड़ा अंतर्देशीय जलाशय नेटवर्क है, जो अंतर्देशीय मत्स्य पालन के विस्तार की महत्वपूर्ण क्षमता प्रस्तुत करता है।
- मिशन अमृत सरोवर: भारत सरकार ने 68,827 अमृत सरोवरों का विकास किया है, जिनमें से 1,222 जल निकाय मत्स्य गतिविधियों से एकीकृत हैं, जिससे मछली संस्कृति, आजीविका विविधीकरण और जलीय पारिस्थितिकी तंत्र का संवर्धन हुआ है।
निष्कर्ष
- कृषि और सहयोगी क्षेत्र केवल खाद्य उत्पादन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे भारत की आर्थिक लचीलापन, सामाजिक समानता और पारिस्थितिकीय स्थिरता की रीढ़ हैं।
- इन क्षेत्रों को सुदृढ़ करना सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) की प्राप्ति, समावेशी विकास सुनिश्चित करने और भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए अत्यंत आवश्यक है।
Source: PIB
Previous article
अमेरिका-इज़राइल-ईरान युद्ध
Next article
मिसाइल रक्षा प्रणालियाँ